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माँग के नियम | नियम की मान्यताएँ | प्रभावित करने वाले कारक

नमस्कार दोस्तों आशा है कि आप सब अच्छे ही होंगे, तो आज हम आपको बताएँगे कि माँग के नियम क्या होते हैं, इनकी मान्यताएँ क्या हैं तथा इनको प्रभावित करने वाले कारक कौन-से हैं? तो चलिए शुरू करते हैं।

माँग के नियमानुसार माँग पर कीमत में होने वाले परिवर्तनों का व्यापक प्रभाव है। यदि हम माँग वक्र का विश्लेषण करें तो हम यह स्पष्टतः अनुभव करते हैं कि वस्तु के मूल्य में वृद्धि होने से उसकी माँग कम हो जाती है और वस्तु के मूल्य में कमी हो जाने पर में वस्तु की माँग में वृद्धि हो जाती है। इस प्रकार वस्तु के मूल्य एवं उसकी माँग के मध्य विपरीत सम्बन्ध (Inverse relationship) होता है। यही माँग का नियम है।

“अन्य बातें समान रहने पर किसी वस्तु या सेवा के मूल्य में वृद्धि होने पर उसकी माँग कम हो जाती है तथा मूल्य कम होने पर उसकी माँग बढ़ जाती है। अतः माँग का नियम, मूल्य व माँग के विपरीत सम्बन्ध को बताता है।”

प्रो० मार्शल के शब्दों में—

इस प्रकार यह नियम बताता है कि माँग रेखा का ढाल ऋणात्मक होता है जैसा कि रेखाचित्र-27 में दिखाया गया है। माँग के नियम के सम्बन्ध में एक उल्लेखनीय तथ्य यह है कि यह नियम एक गुणात्मक कथन है, परिमाणात्मक नहीं; अर्थात् इस नियम से केवल यह अभिप्राय लेना चाहिए कि मूल्यों के बढ़ने पर माँग में कमी होने की प्रवृत्ति पाई जाती है, जबकि मूल्यों के घटने पर माँग में वृद्धि की।

माँग के नियम
माँग के नियम

नियम की मान्यताएँ

अन्य आर्थिक सिद्धान्तों की भाँति माँग नियम भी केवल कुछ पूर्व निर्धारित शर्तों के अन्तर्गत ही सत्य सिद्ध होता है। प्रो० मेयर्स के अनुसार इस नियम की निम्नलिखित मान्यताएँ हैं—

  1. व्यक्तियों के आय स्तर में कोई परिवर्तन नहीं होना चाहिए।
  2. उनका स्वभाव, रुचि तथा अधिमान भी अपरिवर्तित रहते हैं।
  3. सम्बद्ध वस्तु के किसी स्थानापन्न की खोज न की जाए।
  4. वस्तु इस प्रकार की न हो, जिससे समाज में प्रतिष्ठा या सम्मान में वृद्धि हो सके।
  5. भविष्य में वस्तु की कीमतों में परिवर्तन होने की कोई सम्भावना न हो।

माँग को निर्धारित करने वाले महत्त्वपूर्ण कारक

माँग को निर्धारित करने वाले महत्त्वपूर्ण कारक निम्नलिखित हैं—

  1. वस्तु का मूल्य- वस्तु के मूल्य में परिवर्तन होने पर वस्तु की मॉग में भी परिवर्तन हो जाता है। वस्तु का मूल्य बढ़ने पर उस वस्तु की माँग कम हो जाती है और वस्तु का घटने पर उस वस्तु की माँग बढ़ जाती है।
  2. रुचि तथा फैशन में परिवर्तन- यदि उपभोक्ताओं की रुचि तथा समाज में प्रचलित फैशन में परिवर्तन हो जाता है तो नए फैशन की वस्तुओं की माँग में वृद्धि हो जाती है। इसके विपरीत, वस्तुओं के फैशन से बाहर हो जाने पर उनकी माँग में कमी हो जाती है।
  3. मुद्रा की मात्रा में परिवर्तन- जब देश में मुद्रा की मात्रा में वृद्धि कर दी जाती है तो सामान्य कीमत-स्तर ऊँचा हो जाता है और वस्तुओं की औसत माँग कम हो जाती है। इसके विपरीत, यदि देश में मुद्रा की मात्रा कम कर दी जाती है तो सामान्य कीमत स्तर गिर जाता है। और वस्तुओं की औसत माँग बढ़ जाती है।
  4. आय में परिवर्तन- सामान्यतः लोगों की आय में वृद्धि हो जाने से माँग में वृद्धि हो जाती है और आय कम हो जाने पर माँग में कमी आ जाती है।
  5. ऋतु तथा मौसम में परिवर्तन- मौसम में परिवर्तन के साथ-साथ विभिन्न वस्तुओं की माँग में भी परिवर्तन हो जाता है; उदाहरण के लिए शरद् ऋतु में कीमत बढ़ने पर भी गर्म कपड़े की माँग में वृद्धि हो जाती है।
  6. जनसंख्या में परिवर्तन- यदि देश में जनसंख्या बढ़ती है तो कीमतों के अपरिवर्तित रहने पर भी वस्तुओं की माँग बढ़ जाती है। इसके विपरीत, जनसंख्या में कमी होने पर वस्तुओं की माँग घट जाती है।
  7. धन के वितरण में परिवर्तन- यदि समाज में धन का वितरण समान होने लगता है। तो कीमतों में परिवर्तन होने पर भी धनिकों की संख्या घट जाने के कारण विलासिता की वस्तुओं की माँग कम हो जाती है और मध्यम व निर्धन वर्ग की आय में वृद्धि हो जाने के कारण आरामदायक व आवश्यक वस्तुओं की माँग में वृद्धि हो जाती है।
  1. व्यापार की दशाओं में परिवर्तन- तेजीकाल में लोगों की मौद्रिक आय बढ़ जाती है, जिसके कारण कीमतों के बढ़ने के बावजूद वस्तुओं की माँग बढ़ जाती है। इसके विपरीत, मन्दीकाल में मौद्रिक आय में कमी होने के कारण, मूल्य स्तर के गिरने पर भी वस्तुओं के लिए माँग में कमी हो जाती है।
  2. भविष्य में मूल्य बढ़ने की सम्भावना- जब भविष्य में वस्तुओं के मूल्य बढ़ने की सम्भावना होती है तो वर्तमान में मूल्यों के पूर्ववत् रहने पर भी, वस्तुओं की माँग बढ़ जाएगी।
  3. स्थानापन्न वस्तुओं के मूल्य में परिवर्तन होना- यदि वस्तु का मूल्य पूर्ववत् बना रहे किन्तु उसकी स्थानापन्न वस्तुओं के मूल्य में वृद्धि हो जाए तो मुख्य वस्तु की माँग बढ़ जाएगी, क्योंकि स्थानापन्न वस्तु का उपभोग करने वाले उपभोक्ता भी मुख्य वस्तु का उपभोग करने लगेंगे।
  4. संयुक्त माँग की वस्तुओं का मूल्य परिवर्तित होना- कुछ वस्तुओं की माँग संयुक्त रूप में की जाती है; जैसे कार व पेट्रोल। यदि कार का मूल्य बढ़ जाता है तो इसकी माँग में कमी हो जाएगी, साथ ही पेट्रोल की माँग भी घट जाएगी भले ही उसके मूल्य में कोई वृद्धि न हुई हो।

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