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#1 हिन्दी कथा साहित्य ( उपन्यास और कहानी ) व्याख्याएँ : ‘सुखदा’ B.A-1st year, Hindi-2

(1) बस केवल ———— हमारा क्षितिज !

सन्दर्भ– यह अंश जैनेन्द्र कुमार द्वारा लिखित उपन्यास ‘ सुखदा ‘ से लिया गया है ।

प्रसंग – असाध्य तपेदिक रोग से पीड़ित सुखदा अस्पताल के बरामदे में खाट पर पड़ी अपने अतीत के विषय में सोचती हुई बाहर देख रही है । तब खाली आकाश में उसे अपने अतीत के चित्र उभरते नजर आते हैं ।

व्याख्या– सुखदा जब बरामदे से बाहर आकाश और क्षितिज में झाँकती है तो उसे निःस्पन्द अन्तरिक्ष और क्षितिज के खालीपन के अतिरिक्त और कुछ नहीं दिखता , किन्तु जब उस रिक्तता से उसकी भावधारा मुड़ती है तो उस रिक्तता से भी एक विशाल आकर्षक चित्र उभर आता है । वह चित्र बहुत कुछ उसकी जिन्दगी से साम्य रखता है । जिस प्रकार से अब उसकी जिन्दगी में कोई बाधा डालनेवाला नहीं है , उसी प्रकार उस चित्र के दृष्टिपथ में कोई बाधा – व्यवधान नहीं है । क्षितिज के पास जाकर धरती ढल गई है और धीरे – धीरे ढलती हुई क्षितिज के अथाह गर्भ में समा जाती है , ठीक उसके जीवन की तरह ।

यद्यपि अभी वह युवा है , किन्तु रोग के कारण उसका यौवन ढल गया है और अब वह मृत्यु के अथाह क्षितिज में समाने को उद्यत है , मानो क्षितिज के उस पार के विशाल मैदान में कोई उसकी प्रतीक्षा कर रहा है । दूर क्षितिज में उसे कहीं – कहीं भूरे – से बिन्दी के समान मकान दिख रहे हैं , कहीं एकत्रित हो गई सघन हरियाली दिखती है तो कहीं मटमैले धब्बे – से दिखते हैं , जो वस्तुत : उसके स्वयं के जीवन की पृष्ठभूमि की जीवन्तता , सम्पन्नता और विषादता को व्यक्त करते हैं ।

क्षितिज में दूर कहीं दो – एक नदियाँ पतली – सी श्वेत रेखाओं जैसी दिखती हैं । ये रेखाएँ इस बात की प्रतीक हैं कि उसके जीवन के क्षितिज में भी उसके पति और पुत्र का सुखमय जीवन प्रवाहित हो रहा है । यही सब सोचते – सोचते जब उसकी भावधारा भंग होती है तो उसे सारा दृश्य एक धुंधली – सी रेखामात्र लगता है , जो धीरे – धीरे विलुप्त हो जाता है । सुखदा अपने जीवन के अन्त की ओर संकेत करती हुई कहती है कि यही हमारे जीवन का क्षितिज भी है , जो मृत्यु की स्याह दूरियों में विलुप्त हो जाएगा ।

विशेष –

  1. क्षितिज के नि:स्पन्द चित्र के माध्यम से सुखदा के जीवन की नि:स्पन्दता और जीवन्तता को अभिव्यक्त किया गया है ।
  2. सुखदा को अपने जीवन की भूलों पर अब पश्चात्ताप हो रहा है , इसका भी स्पष्ट संकेत यहाँ किया गया है ।
  3. भाषा प्रवाहपूर्ण शुद्ध साहित्यिक खड़ी बोली और शैली भावात्मक तथा चित्रात्मक है ।

(2) कहाँ अनन्त ———— कोई स्थान होगा।

प्रसंग– तपेदिक से पीड़ित सुखदा अस्पताल के बरामदे में खाट पर पड़ी हुई है और सामने फैली प्रकृति को देखती हुई वह जगत् के सम्बन्ध में विचार कर रही है ।

व्याख्या – सुखदा कहती है कि विश्व के सम्बन्ध में हम उतना ही जान सकते हैं , जितनी कि हमारी सामर्थ्य होती है , लेकिन हमारे सामर्थ्य की सीमा ही जगत् की सीमा हो , ऐसा नहीं है । यह विश्व तो एक चित्रपटी की तरह है , जहाँ अनवरत रूप से नए – नए चित्रों का निर्माण होता रहता है । ईश्वर अपनी लीला द्वारा संसार में नित नए चित्र बनाता जाता है । ईश्वर के इस विश्व में सभी के लिए कोई – न – कोई स्थान निश्चित है । सुखदा अपने बारे में सोच रही है कि क्या इस विश्व में उसका भी कोई स्थान होगा ।

विशेष

  1. अलंकारों का प्रयोग देखने को मिलता है । ‘ चलचित्र जगत् में रूपक अलंकार है।
  2. सुखदा संसार – सागर में स्वयं को एक बूंदमात्र समझ रही है।
  3. भाषा शुद्ध साहित्यिक खड़ीबोली तथा शैली भावात्मक एवं आत्मकथात्मक है।

(3) हाय , यह कैसा ———— ऐक बाट है।

प्रसंग – उपन्यास की नायिका सुखदा तपेदिकग्रस्त होकर एक पहाड़ी अस्पताल में भर्ती है । रोग अपनी अन्तिम अवस्था में है । उसके पति की चिट्ठी आई है , जिसमें उससे मिलने की अनुमति उसने चाही है । चिट्ठी पढ़कर सुखदा अपने अतीत में खो जाती है और अपने आचार – व्यवहार का विश्लेषण करने लगती है कि जिस प्रकार से उसने स्वयं अपनी स्वर्णिम गृहस्थी को छिन्न – भिन्न किया है , जिसके परिणामस्वरूप आज वह अपने प्रिय पति , सन्तान और अन्य परिजनों से दूर अस्पताल में एकाकी पड़ी अपनी अन्तिम घड़ियाँ गिन रही है । प्रस्तुत . पंक्तियों में वह अपनी उन स्थितियों का विश्लेषण कर रही है , जब वह अपने समाज में बहुत प्रतिष्ठा पा चुकी थी । लोगों की जुबान पर उसका नाम था , वह अखबारों में छायी रहती थी , किन्तु ये सब चीजें उसने अपना सबकुछ गवाकर प्राप्त की थीं । अपनी उसी स्थिति पर वह स्वयं को धिक्कारती हुई कहती है

व्याख्या – लोगों की दृष्टि में उसने जो मान – प्रतिष्ठा और ऊँचाइयाँ प्राप्त की , उसे आज उन पर गर्व नहीं है , वरन् उसके लिए वह स्वयं को धिक्कारती हुई उसे अपने जीवन का सबसे बड़ा व्यंग्य मानती है । वह अपनी स्थिति का विश्लेषण करती हुई सोच रही है कि मैंने जीवन की वह ऊँचाई स्वयं को अपने आपसे काटकर , अपने स्वाभिमान को खोकर , अपने लोगों के प्रेम का तिरस्कार करके प्राप्त की थी । मेरे इस व्यवहार ने मुझे मान – प्रतिष्ठा तो प्रदान की , किन्तु मुझे एकाकी बनाकर ।

आज मैं जिस स्थिति में हूँ और पीछे मुड़कर देखती हूँ तो उपलब्धि के रूप में मुझे कुछ भी दृष्टिगत नहीं होता । वहाँ मुझे दिखता है तो सिर्फ शुष्क रेत , जिसमें न जीवन का स्नेह है , न आनन्द का रस ( नमी ) और न उल्लास की हरितिमा । उस रेत को ही यदि मैं अपनी उपलब्धि मानकर मुट्ठी में बांधकर सहेजना चाहूँ तो उसकी तपिश पहले तो मुट्ठी ही बन्द नहीं होने देती और फिर भी साहस जुटाकर मैं मुट्ठी बन्द भी कर लूँ तो वह रेत भी वहाँ ठहरना नहीं चाहा वरन् सम्पूर्ण प्रयास के बाद भी वह मुट्ठी से झर जाता है और मुट्ठी रीती ही रह जाती है ।

उस रेत में अगर कुछ है तो केवल मृगतृष्णा, जो कभी शान्त नहीं होती ; क्योंकि वहाँ व्यावहारिक मृदुता और स्नेह जल नहीं है । है तो बस दूर तक फैली निस्सार अथाह रेत। उस अथाह रेत में हिरन की भाँति जल की खोज में भटकना अब मेरे वश में नहीं है ; क्योंकि अब मैं बहुत थक चुकी हूँ । वैसे भी इस रेतीली दौड़ में अपने भीतर का स्नेह मैं सुखा चुकी हूँ

अर्थात् मेरी संवेदनाएं मर चुकी हैं , मैं बिल्कुल नीरस हो चुकी हूँ। अत : पतिसहित अब किसी का भी स्नेह अथवा सहानुभूति इस सूखी बेल में हरियाली का संचार नहीं कर सकता । मैं अब जीवन के ऐसे रेगिस्तान में आ पड़ी हूँ , जहाँ सब तरफ पीड़ा की भयंकर गर्मी , जलन व्याप्त है । इस निर्जन रेगिस्तान में मुझे कहीं कोई नहीं दिखता , जिसकी ओर मैं अपना हाथ बढ़ा सकूँ कि मेरी डूबती साँसों को कुछ सम्बल प्रदान करो । यदि मैं अपनी भूल स्वीकार करके अपने पति की दुनिया में लौटना भी चाहूँ तो नहीं लौट सकती ; क्योंकि उस ओर लौटने का कोई उपाय मेरे पास नहीं है । अब तो मुझे उस पल की प्रतीक्षा है , जब मेरी साँसें टूटकर इस पीड़ा से मुक्ति दिलाएंगी ।

विशेष

  1. लेखक उस पीडादायक स्थिति का चित्रण करने में सफल हुआ है , जब व्यक्ति को अपनी भूल का पश्चात्ताप करने का भी अवसर नहीं मिलता ।
  2. यहाँ यह भी स्पष्ट किया गया है कि आत्मीय सम्बन्धों में व्यक्ति को अपनी भूलों का एहसास तब होता है , जब सब कुछ नष्ट हो चुका होता है और व्यक्ति चाहकर भी भूलसुधार नहीं कर सकता ।
  3. भाषा शुद्ध साहित्यिक खड़ीबोली और शैली भावात्मक , सूक्तिपरक और विश्लेषणात्मक है ।
  4. रेगिस्तान अत्यन्त सार्थक और भावाभिव्यक्ति का वाहक बन गया है ।

(4) जीवन की धारा ———— धागे को कहाँ से पकड़ें ?

प्रसंग – यहाँ पर सुखदा जीवन के उत्स के सम्बन्ध में विचार कर रही है ।

व्याख्या – सुखदा के विचारों से ज्ञात होता है कि वह व्यक्ति को जग के विस्तार में एक अंशमात्र समझती है । उसका मानना है कि यह नहीं कहा जा सकता है कि व्यक्ति के जीवन का प्रारम्भ उसके अपने ही जीवन से होता है , उसका मानना है कि जीवन की धारा जिस आदिस्रोत से चली है , वह अज्ञात है , उसे किसी प्रकार नहीं जाना जा सकता । इसलिए उसके मन में यह प्रश्न उठता है कि वह अपने जीवनरूपी धागे के . छोर को कहाँ ढूँढे , जिससे वह अपने जीवन की कथा की शुरूआत कर सके । इस प्रकार वह मानती है कि जग के विस्तार में व्यक्ति की सत्ता * एक अंशमात्र ही है ।

विशेष

  1. व्यक्ति की सत्ता को इतिहास और जग का एक अंशमात्र माना गया है।
  2. जीवनधारा के आदिस्रोत को जानना असम्भव है , उपन्यासकार ने इस सत्य की प्रतिष्ठा की है।
  3. भाषा साहित्यिक खड़ीबोली और शैली दार्शनिक है।
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