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चोपता तुंगनाथ मंदिर कहॉं स्थित है?

चोपता तुंगनाथ भारत देश के उत्तराखंड राज्य के रुद्रप्रयाग जनपद के उखीमठ मैं स्थित है। जो की समुद्र तल से 3460 मीटर ऊंचाई पर स्थित है। यह मंदिर हजारों साल पुराना भव्य मंदिर है। यहां मंदिर पंच केदार में से दूसरा केदार के नाम से यह मंदिर प्रसिद्ध है। यहां पर पांडवों के द्वारा शिव को प्रसन्न किया गया था। यह मंदिर चोपता से 3 किलोमीटर की दूरी पर पैदल यात्रा द्वारा तुंगनाथ मंदिर स्थित है। यह यात्रा घोड़े खच्चर में या पैदल यात्रा द्वारा किया जाता है। माना जाता है कि यहां पर शिव पार्वती ने ब्याह से पहले तपस्या की थी।

मंदिर का परिचय

चोपता तुंगनाथ में 8 महीना यात्रा खुली रहते हैं। क्योंकि यहां पर काफी मात्रा में लोग बर्फ देखने को भी आते है। तथा यहां पर जनवरी-फरवरी में में मंदिर बर्फ से ढका रहती है। तथा यहां पर जुलाई-अगस्त में यहां पर हरी बुग्याल खिली रहती है। तथा यहां पर बहुत सुंदर नजारा देखने को मिलता है। क्योंकि यहां पर जुलाई-अगस्त में फूल खिले रहते हैं। माना जाता है कि यहां पर स्विजरलैंड जैसा नजारा देखने को मिलता है। और यहां पर हरी-भरी बुग्याल देखने को मिलती है। तथा यहां पर अधिक मात्रा में लोग यहां पर यहां के प्रकृति सौंदर्य को देखने के लिए देश विदेश से आते रहते हैं।

चोपता तुंगनाथ
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तुंगनाथ मंदिर

चोपता तुंगनाथ 3 किलोमीटर की पैदल यात्रा मैं आपको किस्म किस्म के पेड़ पौधे दिखाई देंगे और हरे-भरे जंगल से भरा है यहाँ पर आपके बांज, बुरांश, आदि प्रकार के पेड़ की प्रजातियां पाई जाती हैं। तथा इन जंगलों से कई प्रकार के जड़ी बूटियां आदि भी पाई जाती है। चोपता तुंगनाथ समुद्र तल से 12000 फिट की ऊंचाई पर स्थित है।

तुंगनाथ मंदिर बनावट

तुंगनाथ मंदिर काे महादेव मंदिर का कहां जाता है। इस मंदिर की बनावट पत्थर से की गयी है। इस मंदिर की बनावट बहुत आकर्षक है। जैसे आप मंदिर में प्रवेश करोगे बाहर कर नंदी पत्थर की मूर्ति है। जो महादेव शिवलिंग की तरफ मुँह करके नन्दी स्थिर है। और मंदिर का पूरा हिस्सा पत्थरों से बनाया गया है। और ऊपर लकड़ी के 16 छेद भी है। यह एक विशाल मंदिर भगवान शिव का है। तथा साथ में दूसरा मंदिर में गणेश जी की मूर्ति भी स्थापित की गयी है।

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मंदिर का इतिहास

माना जाता है कि पांडव व्यास ऋषि की सलाह पर वे सभी शिव से मिलने हिमालय पहुंचे। लेकिन शिव महाभारत के युद्ध काे लेकर नाराज थे। इसलिए शिव ने उन सभी पांडवों को को भ्रमित करके भैंसों के झुंड के बीच में भैंस का रूप धारण कर दिया। ( शिव को महेश) के नाम से जाना जाता है। रुप धारण कर वहां से निकल गए। लेकिन पांडव नहीं माने और भीम ने। एक पैर फैलाकर दाे पर्वत के बीच में खडे़ हाे गये। और सारी भैंस चली गयी लेकिन क्यों जाने के लिए तैयार नहीं थे। फिर भीम ने पीछा किया। इस तरह शिव के अपने शरीर के हिस्से पांच जगहों पर छोड़े। ये स्थान केदारधाम यानि पंच केदार के नाम से भी जाने जाते है। माना जाता है कि तुंगनाथ में शिव का बाहू यानि की शिव का हाथ का हाथ का हिस्सा स्थापित है। यह मंदिर 100 साल पुराना मंदिर है।

चंद्रशिला मंदिर

चोपता तुंगनाथ
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चंद्रशिला मंदिर

मान्यता के अनुसार यह वह जगह है जहां चंद्रमा ने अपने क्षय रोग से मुक्त होने के लिए भगवान शिव का तप किया था। जहाँ पर राजा दक्ष प्रजापति की 27 कन्याएं थी। उनमें रोहिणी नाम की कन्या को चंद्रमा द्वारा अत्यधिक प्रेम किए जाने पर राजा दक्ष द्वारा श्राप  दिया गया था। जिस कारण चंद्रमा को क्षय रोग हो गया था। उसी शराफ से मुक्ति हेतु चंद्रमा द्वारा इस स्थान पर भगवान शिव की तपस्या की गई थी तब से इस स्थान को  चंद्रशिला कहा जाता है
चंद्रशिला मंदिर तुंगनाथ से डेढ़ किलाे०मीटर पैदल यात्रा द्वारा किया जाता है।

चंद्रशिला मंदिर जाने के लिए यात्रीयों काे अधिक चढ़ाई चढनी पडती है। वहाँ की अदृश्य देखने के कारण थकान महसूस नहीं करते हैं । लेकिन कुछ दुरी तय करने ऐसा लगता है जैसे हमे  स्वर्ग के द्वार का रास्ते में मन मोहक अलौकिक सौंदर्य से परिपूर्ण फूलों आदि दिखायी देते हैं। ऐसा लगता है। कि मानों संपूर्ण संसार में एक मात्र यह स्थान है। जहां इंसान प्रकृति की गोद में बैठा लगता है चारों ओर विभिन्न प्रकार के सुगंधित फूल नजर आते हैं और सामने चौखंबा पर्वत बाहें फेलाकर अपनी और बुलात नजर आता है। चौखंबा पर्वत का सुन्दर नजारा देखकर यात्री परम आनंद की अनुभूति करते हैं। चन्द्रशिला मन्दिर के आस पास अनेक आकृति के पाषाण है जिनमें बैठकर लोग सुंदर-सुंदर छायाचित्र लेकर यहां की सुन्दरता को क़ैद कर लेते हैं।

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