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भारत में राष्ट्रवाद प्रश्न और उत्तर (class 10)

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न उत्तर-

प्रश्न 1. ‘केसरी’ समाचार पत्र का प्रकाशन किसके द्वारा किया गया?

उत्तर: बाल गंगाधर तिलक।

प्रश्न 2. पूर्ण स्वराज्य का उद्घोष कब और किस अधिवेशन में किया गया था?

उत्तर: पूर्ण स्वराज्य का उद्घोष लाहौर अधिवेशन में 31 दिसम्बर, 1929 ई० को किया गया था।

प्रश्न 3. साइमन कमीशन की नियुक्ति कब की गई थी?

उत्तर: साइमन कमीशन की नियुक्ति 1927 ई० में की गई थी।

प्रश्न 4. असहयोग आन्दोलन कब और क्यों वापस लिया गया था?

उत्तर: असहयोग आन्दोलन चौरी-चौरा की हिंसक घटना के उपरान्त 1922 ई० में वापस लिया गया था।

प्रश्न 5. सविनय अवज्ञा आन्दोलन कब प्रारम्भ किया गया था?

उत्तर: सविनय अवज्ञा आन्दोलन गांधी जी ने मार्च 1930 ई० में चलाने का निर्णय लिया था।

प्रश्न 6. गांधी-इरविन समझौता कब हुआ था?

उत्तर: गांधी-इरविन समझौता 5 मार्च, 1931 ई० में हुआ था।

प्रश्न 7. सत्याग्रह के विचार का क्या मतलब है?

उत्तर: ‘सत्याग्रह’ जन-आन्दोलन की एक नवीन पद्धति थी। सत्याग्रह के विचार में सत्य की शक्ति पर आग्रह और सत्य की खोज पर जोर दिया जाता था। इसका अर्थ यह था कि अगर आपका उद्देश्य सच्चा है, यदि आपका संघर्ष अन्याय के विरुद्ध है तो उत्पीड़क से मुकाबला करने के लिए आपको किसी शारीरिक बल की आवश्यकता नहीं है। प्रतिशोध की भावना या आक्रामकता का सहारा लिए बिना सत्याग्रही केवल अहिंसा द्वारा अपने संघर्ष में सफल हो सकता है। इसके लिए दमनकारी शत्रु की चेतना को झिंझोड़ना चाहिए।

लघु उत्तरीय प्रश्न उत्तर –

प्रश्न 1. जलियाँवाला बाग काण्ड पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।

उत्तर: रौलेट एक्ट के विरोध में पंजाब के अमृतसर जिले की जनता अत्यन्त आक्रोशित थी। इस शहर में सैनिक शासन लागू करके नियन्त्रण जनरल डायर को दिया गया था‌। 12 अप्रैल, 1919 ई० को नगर में सार्वजनिक सभा पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया, जिसकी पूरी जानकारी जनता को नहीं कराई गई।

13 अप्रैल को बैसाखी का त्योहार था। इसी दिन सरकार की नीति का विरोध करने के लिए जलियाँवाला बाग में एक सार्वजनिक सभा का आयोजन किया गया। सभा शान्तिपूर्वक चल रही थी तभी जनरल डायर ने 200 देशी और 50 गोरे सिपाहियों को साथ लेकर बाग के एकमात्र दरवाजे को रोक लिया और निहत्थी जनता पर गोलियों की बौछार शुरू कर दी।

10 मिनट तक निहत्थी भीड़ पर गोलियों की बौछार होती रही। इस हत्याकाण्ड में हजारों व्यक्ति मारे गए और असंख्य घायल हुए। इस घटना से भारतीयों में भयंकर असन्तोष की लहर दौड़ गई।

प्रश्न 2. महात्मा गांधी द्वारा सुझाए गए असहयोग आन्दोलन के सन्दर्भ में तीन मुख्य सुझावों का उल्लेख कीजिए।

उत्तर: महात्मा गांधी ने कहा था कि भारत में ब्रिटिश शासन भारतीयों के सहयोग से ही स्थापित हुआ था और यह शासन इसी सहयोग के कारण चल पा रहा है। अगर भारत के लोग अपना सहयोग वापस ले लें तो साल भर के भीतर ब्रिटिश शासन समाप्त हो जाएगा और स्वराज की स्थापना हो जाएगी।

गांधी जी का सुझाव था कि यह आन्दोलन चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ना चाहिए। सबसे पहले लोगों को सरकार द्वारा दी गई पदवियाँ लौटा देनी चाहिए और सरकारी नौकरियाँ, सेना, पुलिस, अदालतों, विधायी परिषदों, स्कूलों और विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करना चाहिए। अगर सरकार दमन का रास्ता अपनाती है तो व्यापक सविनय अवज्ञा आन्दोलन भी प्रारम्भ किया जाए।

प्रश्न 3. नमक यात्रा उपनिवेशवाद के खिलाफ प्रतिरोध का एक असरदार प्रतीक थी। स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: 31 जनवरी, 1930 ई ० को गांधी जी ने वायसराय इरविन को एक खत लिखा। इस खत में उन्होंने ग्यारह माँगों का उल्लेख किया था। इनमें से कुछ सामान्य माँगे थीं, जबकि कुछ माँगे उद्योगपतियों से लेकर किसानों तक विभिन्न तबकों से जुड़ी हुई थीं।

गांधी जी इन माँगों के माध्यम से समाज के सभी वर्गों को अपने साथ जोड़ना चाहते थे ताकि सभी उनके अभियान में शामिल हो सकें। इनमें से सर्वाधिक प्रमुख माँग नमक कर को समाप्त करने के बारे में थी।

सफलतापूर्वक नमक यात्रा निकालकर गांधी जी ने औपनिवेशिक ब्रिटिश सरकार को अपने सत्याग्रह के तरीके से उत्तर दिया। नमक यात्रा वास्तव में उपनिवेशवाद के विरुद्ध प्रतिरोध का एक सबसे बड़ा प्रतीक थी।

प्रश्न 4. भारत के व्यवसायी वर्ग ने सविनय अवज्ञा आन्दोलन का समर्थन क्यों किया?

उत्तर: प्रथम विश्वयुद्ध की अवधि में भारतीय व्यापारियों और उद्योगपतियों ने अत्यधिक लाभ कमाया था जिससे वे शक्तिशाली हो चुके थे। अपने कारोबार को फैलाने के लिए उन्होंने ऐसी औपनिवेशिक नीतियों का विरोध किया जिनके कारण उनकी व्यावसायिक गतिविधियों में रुकावट आती थी। वे विदेशी वस्तुओं के आयात से सुरक्षा चाहते थे और रुपया – स्टर्लिंग विदेशी विनिमय अनुपात में परिवर्तन चाहते थे।

जिससे आयात में कमी आ जाए। व्यावसायिक हितों को संगठित करने के लिए उन्होंने 1920 ई० में भारतीय औद्योगिक एवं व्यावसायिक कांग्रेस (इण्डियन इण्डस्ट्रियल एण्ड कॉमर्शियल कांग्रेस) और 1927 ई० में भारतीय वाणिज्य और उद्योग परिसंघ (फेडरेशन ऑफ इण्डियन चेम्बर ऑफ कॉमर्स एण्ड इण्डस्ट्रीज-फिक्की) का गठन किया।

पुरुषोत्तम दास ठाकुर और जी० डी० बिड़ला जैसे जाने-माने उद्योगपतियों के नेतृत्व में उद्योगपतियों ने भारतीय अर्थव्यवस्था पर औपनिवेशिक नियन्त्रण का विरोध किया और सविनय अवज्ञा आन्दोलन का समर्थन किया।

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न उत्तर-

प्रश्न 1. रौलेट एक्ट का सविस्तार वर्णन कीजिए।

उत्तर: माण्टेग्यू की घोषणा के पश्चात् माण्टेग्यू चेम्सफोर्ड रिपोर्ट तैयार हुई। इस रिपोर्ट को कार्यरूप देने के लिए 1919 ई० में एक अधिनियम पारित किया गया जिसमें प्रान्तों में आंशिक उत्तरदायी शासन स्थापित करने का उल्लेख किया गया, किन्तु औपनिवेशिक स्वराज के विषय में नीति स्पष्ट नहीं की गई।

अतः स्थिति में कोई विशेष परिवर्तन नहीं आया बल्कि राष्ट्रीय आन्दोलन में और तीव्रता आ गई‌। इस आन्दोलन का दमन करने के लिए ब्रिटिश सरकार ने न्यायाधीश रौलेट की अध्यक्षता में एक समिति नियुक्त की। फरवरी 1919 ई० में रौलेट ने दो विधेयक प्रस्तावित किए जो पारित होने के पश्चात् रौलेट एक्ट के नाम से प्रसिद्ध हुए।

अनेक भारतीय नेताओं द्वारा इस कानून का विरोध किया गया, किन्तु ब्रिटिश सरकार ने 21 मार्च, 1919 ई० को इसे लागू किया। इस एक्ट के अनुसार किसी भी व्यक्ति को मात्र सन्देह पर ही गिरफ्तार किया जा सकता था अथवा गुप्त मुकदमा चलाकर उसे दण्डित किया जा सकता था। रौलेट एक्ट को भारतीयों ने ‘काला कानून’ कहकर पुकारा।

रौलेट एक्ट के पास होने से गांधी जी का अंग्रेजों की न्यायप्रियता और ईमानदारी से विश्वास समाप्त हो गया। उन्होंने रौलेट एक्ट के विरोध में जनमत तैयार करने के लिए देश का तूफानी दौरा किया और देशवासियों को सलाह दी कि वे सत्य और अहिंसा द्वारा इस ‘काले कानून’ का विरोध करें।

प्रश्न 2. असहयोग आन्दोलन स्थगित होने के कारणों को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: गांधी जी ने धार्मिक आन्दोलन अर्थात् ‘खिलाफत आन्दोलन’ को राष्ट्रीय भावना से जोड़कर बहुत बड़ी भूल की। इस भूल का परिणाम यह हुआ कि राष्ट्रवादी, जो भारतीय समाज की समस्याओं के लिए लड़ रहे थे, बुरी तरह निराश हो गए। उन्हें गांधी जी की नीति पर सन्देह होने लगा। गांधी जी को विश्वास था कि ब्रिटिश सरकार के परम भक्त मुसलमानों के इस आन्दोलन में साथ देने पर; वे लोग भी कांग्रेस का साथ देंगे।

लेकिन ऐसा न हुआ और मुसलमानों के विरुद्ध हिन्दुओं में भारी आक्रोश फैल गया। इसके फलस्वरूप जगह-जगह दंगे भड़के और जनता की शक्ति आपस में ही नष्ट होने लगी। सरकार की दमनकारी नीति इतनी उग्र हो गई कि सभी नेता जेल भेज दिए गए और आन्दोलन दिशाहीन हो गया।

जनता का आक्रोश सरकारी दमन के विरुद्ध इतना उग्र हो उठा कि वह अहिंसात्मक नीति को त्यागकर क्रूर हिंसा पर उतारू हो गई। अपनी नीतियों के विरुद्ध जाते देखकर गांधी जी ने इस आन्दोलन को स्थगित कर दिया।

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