1. Home
  2. /
  3. Other
  4. /
  5. #4 हिन्दी कथा साहित्य ( उपन्यास और कहानी ) व्याख्याएँ : ‘सुखदा’ B.A-1st Year, Hindi-2

#4 हिन्दी कथा साहित्य ( उपन्यास और कहानी ) व्याख्याएँ : ‘सुखदा’ B.A-1st Year, Hindi-2

(17) जमना आने पर ———— नहीं हो पाता।

प्रसंग – क्रान्तिकारी सिद्धान्तों के विपरीत लाल सुखदा के साथ एक अलग मकान में रहने लगा है , वह भवन क्रान्तिकारी संघ का है । क्रान्तिकारी संघ के मुखिया हरीश उसे प्राणदण्ड देने का दायित्व प्रभात को सौंपते हैं और भवन की चाबी लेकर उस पर कब्जा लेने का आदेश भी उसे देते हैं । प्रभात सुखदा के पास हरीश का पता पूछने जाता है और भवन की चाबी माँगता है । सुखदा हरीश से मिले बिना उसे न लाल का पता बताने को तैयार है और न भवन की चाबी देने को । सुखदा को पता चलता है कि हरीश उसे जमना किनारे के जंगल में मिल सकते हैं । वह अपने पति कान्त से स्वयं को वहाँ ले चलने के लिए कहती है और अगले दिन प्रातः जमना – किनारे पहुँच जाती है । वहाँ वह जिस भारतीय सभ्यता और संस्कृति का परिचय प्राप्त करती है , उसी का विवेचन वह अपने मन में करती हुई कहती है

व्याख्या – जमना – किनारे पहुंचने पर मुझे ज्ञात हुआ कि आज कोई भारतीय पर्व है , जिस कारण वहाँ एक बड़ी भीड़ इकट्ठा है । यह भीड़ गतिशील है । यहाँ निरन्तर लोग आ रहे हैं और जमना में स्नान – ध्यान के पश्चात् वापस जा रहे हैं । इस भीड़ में स्त्रियों का बाहुल्य है । इस भीड़ को देखकर मुझे आश्चर्य हुआ कि भारतीय परम्पराएँ भी कितनी विचित्र , बहुरंगी , पवित्र और मनोहारी हैं । एक मैं हूँ कि भारतीय होने के बाद भी अपनी इन परम्पराओं को भूल चुकी और उनसे अपना नाता तोड़ चुकी हूँ।

इस परम्परा में कितना आकर्षण है कि सैकड़ों – हजारों वर्षों से इस विशेष दिन पर सवेरा होते ही असंख्य स्त्रियाँ अपने – अपने घरों से निकलकर सवेरे ही गंगा अथवा जमना – तट के लिए निकल पड़ती है । इस समय इन स्त्रियों का उल्लास बताता है कि उनके लिए इस उत्सव का क्या व कितना महत्त्व है।

इस उत्सव के हर्ष और उल्लास ने इनके मन की समस्त शंकाओं को मिटाकर इन्हें निर्भय बना दिया है , तभी तो ये कभी अकेले घर से बाहर न निकलनेवाली स्त्रियाँ बिना किसी संकोच के गंगा अथवा जमना – स्नान के लिए भोर में ही निकल पड़ती हैं और फिर स्नान – ध्यान के पश्चात् अपने घरों को लौट जाती हैं । ये स्त्रिया इस उत्सव के दिन को कभी नहीं भूलतीं और एक मैं हूँ कि मुझे पता ही नहीं चलता कि यह उत्सव कब आता है और कब चला जाता है । यह मेरे अपनी सभ्यता और संस्कृति से दूर होते चले जाने का प्रतीक है , जो शायद ठीक नहीं है ।

विशेष

  1. भारतीय सभ्यता और संस्कृति हम भारतीयों को एकता के सूत्र में बाँधे रखती है , इसी से हमारी पहचान भी है ।
  2. हमारे उत्सव एवं पर्व हमारे भीतर उत्साह का संचार करके हमें नई स्फूर्ति प्रदान करते हैं ।
  3. अपनी सभ्यता एवं संस्कृति से कटना बड़ा कष्टकर होता है ।
  4. भाषा प्रवाहपूर्ण , सहज – सरल खड़ीबोली और शैली विवेचनात्मक एवं विचारात्मक है ।

(18) शैतान सर्वव्यापी ———— कहा ? में —

प्रसंग – यमुना नदी के किनारे हरिदा सुखदा को लाल की चारित्रिक दुर्बलता के विषय में बताते हैं कि लाल ने मोहग्रस्त होकर ही उसे उसके रुपये – गहने लौटाए हैं । अपने इस कृत्य द्वारा उसने जहाँ तुम्हें छला है , वहीं हमारे संगठन के साथ भी छल किया है । वास्तव में उसका यह कृत्य शैतानवाला है ।

व्याख्या – संसार में शैतान ( युराई और बुरा करनेवाले ) सब जगह उपस्थित है और वह लोगों को अपनी शैतानियत से आतंकित करता रहता है। यदि संसार में शैतान सब जगह उपस्थित न होता तो भगवान् को भी सब जगह उपस्थित होने की आवश्यकता न पड़ती । लोगों को शैतान को शैतानियत से बचाने के लिए भगवान् को वहाँ – वहाँ रहना पड़ता है , जहाँ – जहाँ शैतान रहता है । शैतान क्योकि सर्वव्यापक है इसलिए भगवान् को भी सर्वव्यापी होना पड़ा है ।

शैतान क्योकि हम सबमें उपस्थित है और उसकी शैतानियत की सजा यदि हम उसे देते हैं तो इसका अर्थ स्वयं को सजा देना है , किन्तु उसे सजा देना आवश्यक है । यदि हम स्वयं की सजा से डरकर शैतान को सजा नहीं देगे तो इसका अर्थ शैतान को क्षमा करना नहीं है , बल्कि शैतान को खुराक देकर उसका पोषण करना है । कहने का आशय यही है कि यदि हम शैतान को सजा नहीं देगे तो उसकी शैतानियत निरन्तर बढ़ती चली जाएगी। लाल के अन्दर यदि शैतानियत नहीं तो उसे अपने कृत्य के विषय में बताना चाहिए था; क्योकि उसने सभी कार्य चोरी से किए हैं जो कि उसकी शैतानियत के प्रमाण है । हरिदा सम्भवतः आगे कहना चाहते हैं कि यदि उसने अपने कृत्य के विषय में बताया होता तो मैं उसे आज क्षमा कर देता । हरिदा की बात को बीच में ही काटकर सुखदा कहती है कि वह आपको बताता कहाँ से , उस समय आप नहीं थे ।

विशेष

  1. भगवान् को सर्वव्यापकता का कारण शैतान की सर्वव्यापकता को बताया गया है। उपन्यासकार का ईश्वर की सर्वव्यापकता के सम्बन्ध में यह दृष्टिकोण सर्वथा नवीन है ।
  2. उपन्यासकार ने यहाँ यह भी द्योतित किया है कि गलत कार्य की सजा अवश्य दी जानी चाहिए । यदि ऐसा नहीं किया जाता तो इसका अर्थ यह है कि हम अपराध को प्रश्रय ही नहीं दे रहे है , वरन् उसको भोजन देकर भली – भांति उसका पोषण भी कर रहे हैं ।
  3. भाषा प्रवाहमयो , सहज और प्रभावपूर्ण तथा शैली सूक्तिपरक , विवेचनात्मक एवं आध्यात्मिकता से प्रेरित है ।

(19) क्या तुम्हें बताऊँ ———— क्रान्ति चाहता हूँ।

प्रसंग – यमुना नदी के किनारे लाल हरिदा से भेट करने आता है। हरीश उस पर आरोप लगाते हैं कि उसने मोहमस्त होकर सुखदा के रुपये – गहने लौटाए । हरिदा के यह पूछने पर कि उसने ऐसा क्यों किया , लाल बहुत अधिक तर्क – वितर्क नहीं करता और चुप रहता है । तब हरिदा सुखदा से पूछते हैं कि तुमने क्या सोचकर लाल से गहने और रुपये लिए। सुखदा अपना अपराध स्वीकार करती है । इस पर लाल कुछ कहना चाहता है , तब हरिदा उससे कहते हैं

व्याख्या – लाल तुमने जो जेवर सुखदा को लौटाया है , वह शायद इसलिए लौटाया है कि तुम स्वयं को उसका सबसे बड़ा हितैषी मानते हो और इस कारण उसकी चिन्ता भी बहुत अधिक करते हो । मगर तुम यह नहीं जानते कि तुम उसके जितने हितैषी और शुभचिन्तक हो , उतना ही में भी हूँ । मैं भी उसे उसके ये आभूषण लौटा सकता था , किन्तु उसके हित को दृष्टिगत रखते ही मैने ऐसा नहीं किया । दल का नायक होने के कारण सुखदा का ख्याल रखने की सबसे पहली जिम्मेदारी मेरी थी , तुम्हारी नहीं । यदि मैने उसे उसके आभूषण नहीं लौटाए तो उसका कोई कारण होगा । आभूषण हम जैसे क्रान्तिकारियों और साम्यवादियों के लिए कलंक है।

हमारे इस देश की आधी आबादी ऐसी है , जिसे भरपेट भोजन नहीं मिलता और उसे भूखो सोना पड़ता है । यह स्थिति हम सबके लिए एक कलंक है । इस स्थिति में क्या तुम मुझसे यह अपेक्षा रखते हो कि मैं अपने दल के किसी सदस्य का आभूषण धारण करना सहन कर सकता हूँ । यह कहाँ का साम्यवाद है कि एक ओर तो हम देश और समाज में साम्यवाद की स्थापना के लिए संघर्ष कर रहे हैं , वहीं दूसरी ओर हम अथवा हमारे अपने लोग उस स्थिति में आभूषण धारण किए घूमें, जब देश की आधी आबादी को भरपेट भोजन न मिल रहा हो , ऐसे दोहरे मानदण्ड अपनाकर हम क्रान्ति नहीं ला सकते । तुम तो जानते ही हो कि मैं किस प्रकार की क्रान्ति लाना चाहता हूँ। मैं क्रान्ति का दिखावा नहीं करना चाहता, वरन् वास्तविक क्रान्ति लाना चाहता हूँ । क्रान्ति के नाम पर हम लोगों के साथ यह छल नहीं कर सकते कि हम तो सुख – सुविधापूर्ण और विलासिता का जीवन व्यतीत करें और लोगों को भरपेट खाना न मिले ।

विशेष

  1. अपने अथवा अपने लोगों के हितसाधन में लगे क्रान्ति नहीं ला सकते ।
  2. क्रान्ति के लिए आवश्यक है कि हम अपने – पराये में कोई भेदभाव न रखें ।
  3. भाषा स्पष्ट , सरल तथा प्रवाहपूर्ण खड़ीबोली और शैली सूक्तिपरक , विवेचनात्मक और विचारात्मक है ।

(20) आदमी में जो है ———— और साथिन है।
अथवा उधर पश्चिम की ———— और साथिन है।

प्रसंग – यमुना नदी के किनारे लाल हरिदा से भेंट करने आता है। हरीश उस पर आरोप लगाते है कि उसने मोहग्रस्त होकर सुखदा के रुपये – गहने लौटाए, उसने अपने कमरे पर किराए की स्त्री को रखा। लाल इन सब आरोपों की कोई सफाई नहीं देता। वह हरीश से कहता है कि मैंने जो अच्छा समझा वह किया; अब यह आप पर निर्भर है कि आप जो अच्छा समझते हो वह करें। आप चाहें तो मेरी गर्दन हाजिर है, लेकिन साथ ही लाल यह भी कहता है कि आपको मनुष्य की दुर्बलता एवं क्षुद्रता को भी स्वीकार करना होगा।

व्याख्या – हरीश से लाल कहता है कि अगर वे व्यक्ति की सिर्फ अच्छाइयों को ही स्वीकार करेंगे तो वे उसे महान् नहीं बना सकते ; क्योंकि उसके अन्दर बुराइयाँ भी होती हैं । इन बुराइयों से कटकर वह पूरा नहीं होगा । लाल कहता है कि भारतीय संस्कृति में व्यक्ति एवं समाज में जिन बातों को अवगुण समझकर फेंक दिया जाता है ; पश्चिम की सभ्यता उन अवगुणों को भी अपनाती है । पश्चिम की सभ्यता में कोरा आदर्श नहीं है , बल्कि व्यवहारवाद , कर्मवाद और ठेठ तनवाद भी उसमें सम्मिलित है । वहाँ पर स्त्री को देवी नहीं , बल्कि केवल मानवी समझा जाता है जो कि किसी भी पुरुष का साथ निभाने के लिए स्वच्छन्द है । लाल का विचार है कि पश्चिमी सभ्यता के तूफान में भारतीय आदर्शवाद उड़कर रह जाएगा ।

विशेष

  1. लाल पश्चिमी सभ्यता का अन्धानुयायी है; अत: उसे भारतीय संस्कृति की अपेक्षा पश्चिमी संस्कृति में अच्छाइयाँ नजर आती हैं ।
  2. यहाँ लाल यह भूल जाता है कि भारतीय संस्कृति कोरी आदर्शवादी नहीं है । यहाँ पर भी नारी को सहचरी माना जाता है और ‘गीता‘ जैसे ग्रन्थ कर्मवाद को स्थापित करते हैं ।
  3. पश्चिम के ठेठ तन वाद की स्तुति नहीं की जा सकती; क्योंकि वह स्त्री को हीन तथा तुच्छ बनाता है ।
  4. भाषा सरल साहित्यिक खड़ीबोली तथा शैली व्यंजनात्मक एवं आलोचनात्मक है।

(21) शायद समय ———— अभियान होगा।

प्रसंग – लाल सुखदा को लेकर यमुना के तट पर बुलाई गई क्रान्तिकारियों की गुप्तसभा में पहुंच जाता है । वहाँ उपस्थित सभी क्रान्तिकारी लाल के आचरण को शंका की दृष्टि से देखते है तो दल के नेता हरीशदा उसे देशद्रोही घोषित करते हुए दल के कार्य को ही भंग करने का निर्णय लेते हैं । लाल कहता है कि एक आदमी के लिए कार्य को भंग क्यों किया जा रहा है। मुझे दल से अलग करके कार्य को आगे बढ़ाया जा सकता है। हरीश कहता है कि बात तुम्हें दल से अलग करने की नहीं है, अपितु लोगों के विश्वास की है । तुम पश्चिम से आने वाले तूफान की बात करते हो और यहाँ चल रही गांधी की आँधी को कुछ मानने को तैयार नहीं हो , जबकि यह आँधी तुम्हारे उस पश्चिम के तूफान से कमतर नहीं है । यह बात अब देशवासी भी जान चुके हैं । इसलिए अब किसी दल की आवश्यकता नहीं रह गई है । इसी सन्दर्भ में वह कहता है।

व्याख्या – दल का कार्य भंग कर देने से देश में क्रान्तिकारी आन्दोलन समाप्त नहीं हो जाएगा । अब लोगों को क्रान्ति करने के लिए किसी दल की अगुवाई की आवश्यकता नहीं है । समय अब काफी बदल चुका है । गांधीजी के आन्दोलन से अब देश के लोगों में स्वतन्त्रता – प्राप्ति के प्रति जागृति आ गई है । अब स्वतन्त्रता के लिए जो भी आन्दोलन होगा , वह स्वतःस्फूर्त होगा और अत्यन्त व्यापक होगा , उसको दबाना शायद अब विदेशियों के बूते की बात न हो । हमने और हमारे जैसे अन्य क्रान्तिकारी दलों ने लोगों में जो जागृति लाने का कार्य किया है , वह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण और ऐतिहासिक है।

उसके बिना क्रान्ति की ज्वाला दहकना असम्भव था। ज्वाला भड़काने के लिए जिस चिंगारी की आवश्यकता होती है , वह हमने फूंक दी है , अब तो वह जंगल की आग की तरह स्वयमेव विकराल रूप धारण कर लेगी, अब क्रान्ति के लिए और चिंगारियाँ चटखाने की आवश्यकता नहीं है । चिंगारी तो लग चुकी है, अब वह स्वाभाविक रूप से धीरे – धीरे विकराल रूप धारण कर लेगी और सम्पूर्ण राष्ट्र में एक साथ स्वतन्त्रता आन्दोलन भड़क उठेगा। वह आन्दोलन हमारे जैसे किसी एक दल का नहीं होगा, वरन् सम्पूर्ण देश का होगा , देश के प्रत्येक नागरिक का होगा; अत: अब हमारे दल और उसके कार्य की आवश्यकता शायद नहीं रह गई है । यही बात दृष्टिगत रखते हुए कार्य भंग करने का निर्णय लिया गया है।

विशेष

  1. गांधीजी के आन्दोलन के महत्त्व को रेखांकित किया गया है और यह भी स्पष्ट किया गया है कि स्वतन्त्रता आन्दोलन के लिए यदि देश की जनता में एक बार जागृति आ जाए तो फिर उसे दबाना किसी भी शासन के लिए सम्भव नहीं है ।
  2. भाषा शुद्ध साहित्यिक खड़ीबोली और शैली विचारात्मक एवं विवेचनात्मक है ।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *