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  5. #3 हिन्दी कथा साहित्य ( उपन्यास और कहानी ) व्याख्याएँ : ‘सुखदा’ B.A-1st Year, Hindi-2

#3 हिन्दी कथा साहित्य ( उपन्यास और कहानी ) व्याख्याएँ : ‘सुखदा’ B.A-1st Year, Hindi-2

(12) मैं स्त्री के इस ———— आधार पर चलें।

प्रसंग – लाल सुखदा के रुपये लौटाने आया हुआ है और मौका पाकर सुखदा को विलासकक्ष में आने के लिए कहता है। सुखदा अपने पति के सामने इस बात को रखती है तो उसका पति लाल को मना कर देता है कि सुखदा वहाँ नहीं जाएगी, सुखदा भी अपने पति की बात का अनुमोदन करती है , पर लाल की जिद है कि तुम्हें आना ही होगा।

व्याख्या – लाल सुखदा को बैठक में आने के लिए मना रहा है। उसने अपनी जिद को तार्किकता का चोला पहना दिया है। उसका कहना है कि यह सोचना गलत है कि पुरुष पराक्रमी हो और स्त्री शीलवती, इसी कारण आन्दोलन में एकांगिता आती है। स्त्री के अन्दर शील के साथ-साथ पराक्रम भी होता है। स्त्री को शीलवती बताकर उसे घर में बैठा दिया जाता है। इस कारण समाज में कान्तिवादिता और व्यक्तिवादिता बढ़ती है। उसका कहना है कि स्त्रियों को भी आन्दोलन में खुलकर भाग लेना चाहिए और घर से बाहर निकलकर व्यापक समाज का अंग बनना चाहिए।

विशेष

  1. लाल बेहद वाक्पटु है, वह कान्त और सुखदा के ना को हाँ में बदलने के लिए तों का आश्रय ले रहा है।
  2. आन्दोलन इत्यादि की बात करके लाल सुखदा को बैठक में आने के लिए प्रेरित कर रहा है।
  3. भाषा सरल , साहित्यिक हिन्दी और शैली विचारात्मक है ।

(13) स्त्री को राह ———— मोल–भाव करके आओ।

प्रसंग – सुखदा अपने पुत्र को नैनीताल पढ़ाना चाहती है । पहले उसका पति कान्त इसके लिए तैयार नहीं होता , पर बाद में मान जाता है । सुखदा उससे कहती है कि वह उसके जेवर बेच दे । वह अपनी चूड़ी भी बेचने के लिए उतारकर दे देती है । बाद में अस्पताल में पड़ी हुई इस घटना को याद करती हुई वह विचार कर रही है ।

व्याख्या – उसके पति को उसका प्रतिरोध करना चाहिए था । अगर आप स्त्री की हर बात माने जा रहे हैं तो आप उसे गलत कार्य के लिए राह दे रहे हैं । इसका अर्थ यह है कि आप उसे नहीं समझ पा रहे हैं । स्त्री गति नहीं चाहती । वह नहीं चाहती कि उसकी हर बात को स्वीकार कर लिया जाए , वह तो चाहती है कि अगर उसे स्वीकृति मिले तो उसमें स्वामित्व का भाव हो । कोई हो , जो उसे स्वीकृति दे , उस पर स्वामित्व जताए।

लेकिन अगर पुरुष उसको हर बात को सिर झुकाकर स्वीकार करता जाता है तो स्त्री का क्षोभ सीमा लाँघ जाता है । उस दिन ऐसा ही हुआ । मेरे पति ने मेरा प्रतिरोध नहीं किया , वरन् वे निर्णय के पीछे हो लिए अर्थात् उन्होंने मेरे निर्णय को स्वीकार कर लिया और बेसुध से मुझे देखते रहे । उनके इस व्यवहार से मेरा क्षोभ और बढ़ गया तथा मेरे पास उनके इस व्यवहार का इसके अतिरिक्त और कोई उत्तर न था कि चूड़ियाँ उठाकर उनके सामने पटक दूं और कहूँ कि अभी जाकर सर्राफे में इनको बेचकर आओ । और मैंने वैसा ही किया । वे उठे और चूड़ियाँ लेकर बाजार चले गए ।

विशेष

  1. यहाँ कान्त के दब्बूपन पर सुखदा अपना क्षोभ प्रकट कर रही है ।
  2. स्त्री मनोविज्ञान का जैनेन्द्र द्वारा सूक्ष्म चित्रण किया गया है ।
  3. भाषा परिष्कृत खड़ीबोली और शैली व्याख्यात्मक है ।

(14) यह जो जनसाधारण ———— उनसे नहीं है।

प्रसंग – सुखदा अपने पुत्र विनोद को पढ़ने के लिए नैनीताल भेजना चाहती है । बच्चे और अपनी उन्नति के लिए वह इसे आवश्यक भी मानती है, जबकि उसका पति कान्त ऐसा नहीं मानता । वह मानवतावादी आम दृष्टिकोण से उन्नति को परिभाषित करता हुआ कहता है

व्याख्या – देश और समाज का जो बहुसंख्यक साधारण वर्ग है , उन्नति के सन्दर्भ में बात करते समय हम उसकी गिनती नहीं करते , जो कि गलत है । इस वर्ग की उपेक्षा नहीं की जानी चाहिए ; क्योकि समाज का यही एक वर्ग है , जो सदैव ही एक जैसा रहता है और परिस्थितियों के सापेक्ष एकजुट भी रहता है । वास्तव में यही वर्ग समाज की रीढ़ है । यही मानव – सभ्यता को स्थिरता प्रदान करता है । एक उन्नति वह है जो समाज के लोगों को आडम्बरहीन साधारण जीवन जीने की प्रेरणा देती है । सम्भवत : वही वास्तविक उन्नति भी रही है । वहाँ उन्नति के नाम पर व्यर्थ की भाग – दौड़ अथवा दूसरे को गिराकर आगे निकलने की गलाकाट प्रतिस्पर्धा का वेग नहीं है । वहाँ जीवन की परिस्थितियों में बहुत उतार – चढ़ाव दृष्टिगत नहीं होता , बल्कि एकसमान सपाट गति दृष्टिगत होती है।

हम जीवन की बाहरी तड़क – भड़क में जीवन की साधारणता को भूलते आए हैं । क्योंकि हम उसे ही उन्नति मानते हैं और जो लोग तड़क – भड़क का यह आडम्बर करके स्वयं को उन्नतिशील प्रगतिवादी मानकर स्वयं को समाज में उसी प्रकार सर्वश्रेष्ठ मानते हैं , जिस प्रकार सिंह स्वयं को जंगल का राजा मानता है । इन आडम्बरों से व्यक्ति की बाहरी शोभा भले ही बढ़ जाती हो , किन्तु इससे उसका आन्तरिक विकास रंचमात्र भी नहीं होता , बल्कि बाहरी आडम्बर के बढ़ने के साथ उसका अन्तरतम और अधिक खोखला तथा सारहीन होता जाता है । किसी भी जाति का स्वस्थ विकास , उन्नति , उसकी स्वयं को श्रेष्ठ बनाए रखने की शक्ति और सौन्दर्य इस आडम्बर में नहीं है , बल्कि उसके आन्तरिक विकास में है।

विशेष

  1. कान्त चारित्रिक शुद्धता को वास्तविक उन्नति मानता है , उसकी दृष्टि में धन – दौलत कमाकर सुख – साधन जुटाकर समाज के सम्मुख आडम्बर करना उन्नति नहीं है ।
  2. किसी समाज को स्थायित्व उसके लोगों का चारित्रिक विकास प्रदान करता है । वही उसकी वास्तविक शक्ति है ।
  3. भाषा – परिष्कृत खड़ीबोली और शैली विवेचनात्मक है ।

(5) भावुकता पर बुनियाद ———— काम आर्थिक है।
अथवा भावुकता पर बुनियाद ———— पूँजीवाद है।

प्रसंग – क्रान्तिकारी हरीश के ऊपर हत्या का आरोप लग चुका है । अत: वे पुलिस से बचने के लिए कहीं चले गए हैं । उनका उत्तरदायित्व प्रभात ने ले लिया है । लाल ने क्रान्तिकारी संघ के कार्यालय का नाम विलास भवन’ रख लिया है । उसके लिए खतरे बढ़ गए हैं; अत: वह देश छोड़कर बाहर जाना चाह रहा है, सुखदा के जेवर, गहने लौटाकर लाल उसे पूरी तरह अपनी गिरफ्त में ले चुका है। वह सुखदा को उसके घर से विलास भवन ले आता है और उससे विस्तारपूर्वक अपनी बात कह रहा है।

व्याख्या – क्रान्ति के सम्बन्ध में लाल के विचार संघ के अन्य सदस्यों से अलग है। वह भावना को मूर्खतापूर्ण चीज मानता है और कहता है कि भावना के आधार पर जनान्दोलन नहीं खड़ा किया जा सकता। वह साम्राज्यवाद को एक शेर मानता है और पूँजीवाद को उस शेर का पेट। उसका कहना है कि भावना के बल पर इस शेर का मुकाबला नहीं किया जा सकता। इसके लिए हमें ठोस आर्थिक कार्यक्रम बनाने होंगे, सिर्फ राजनीति करने से काम नहीं चलेगा और आत्म – त्याग से तो बिल्कुल नहीं। ऐसा प्रतीत होता है कि लाल पूँजीवाद के खतरों को अच्छी तरह जानता है , तभी वह उनका मुकाबला करने की बात करता है । लेकिन लाल इस बात को भूल जाता है कि बिना राजनैतिक स्वाधीनता के किसी प्रकार के आर्थिक सुधार नहीं किए जा सकते।

विशेष

  1. लाल के विचारों से प्रतीत होता है कि वह भारतीय संस्कृति के मूल तत्त्व ‘ त्याग की भावना ‘ को अच्छा नहीं मानता ।
  2. लाल के विचारों से पता चलता है कि वह पूँजीवाद के खतरों से परिचित है ।
  3. भाषा प्रवाहपूर्ण , सहज और प्रभावी है तथा शैली आलोचनात्मक एवं विचारात्मक है ।

(16) आन्दोलन पुरानी ———— कि सब गया।
अथवा आन्दोलन पुरानी ———— पैदा करता है।
अथवा घर-गृहस्थी में ———— इकट्ठे नहीं हो पाते।

प्रसंग – सुखदा का पति कान्त उसे एक पत्र देता है । यह पत्र लाल का है , जिसमें वह भारतीय संस्कृति के परिवारवाद की आलोचना करता है ।

व्याख्या – इस पत्र में लाल लिखता है कि वह जापान जा रहा है। वह सुखदा को बताता है कि क्रान्तिकारी आन्दोलन की लीक तोड़कर उसे नई शक्तियों से जोड़ना होगा । वह लिखता है कि हमें सामाजिक संस्कृति का निर्माण करना होगा। भारतीय नैतिकतावादी संस्कृति व्यक्ति को परिवार की परिधि में घेरकर बाँध देती है। पारिवारिकता सार्वजनिकता में गाँठ पैदा करती है। हमें स्वार्थी बनाती है । हमें मिलकर एक राष्ट्र नहीं बनने देती। यदि हमें राष्ट्र की एकता-अखण्डता की रक्षा करनी है, इसके कल्याण के लिए भी कुछ करना है तो इसके लिए हमें सबसे पहले अपने घर-परिवार, रिश्ते-नातेदारों से मुख मोड़ना पड़ेगा; क्योंकि हमारा परिवार और उसके स्वार्थ हमें कहीं-न-कहीं अपना बलिदान करने से रोकते हैं। इसका कारण हमारी संस्कृति है, जो हमें सबसे पहले परिवार के भरण-पोषण और रक्षण के कर्तव्य में बाँधती है।

यही बन्धन हमारे राष्ट्र – प्रेम की सबसे बड़ी बाधा है । हम यह नहीं सोच पाते कि यदि देश का कल्याण होगा तो हमारे परिवार का कल्याण तो स्वतः ही हो जाएगा। हम परिवार-कल्याण के छोटे-छोटे भंवरों में चक्कर काटते हुए ही अपना जीवन व्यर्थ गंवा देते हैं। सम्पूर्ण धारा के विषय में तो हम सोच ही नहीं पाते। इस सबके मूल कारण के रूप में लाल विवाह को देखता है। वह उन्मुक्त जीवन का समर्थक है। वह मानता है कि विवाह बन्धन में बाँध देता है, जबकि स्वच्छन्द प्यार एक ताकत है, जो व्यक्ति को स्वतन्त्रता प्रदान करता है।

विशेष

  1. लाल अपनी स्वच्छन्द जीवन – शैली को दार्शनिकता का चोगा पहना रहा है ।
  2. परिवार समाज की धुरी है और राष्ट्र एक बड़ा परिवार ही है । लाल यह बात नहीं समझ पाता , वह परिवार , राष्ट्र और प्यार में तालमेल बैठाकर अपनी स्वच्छन्द जीवन – शैली को तार्किकता प्रदान करने का प्रयत्न कर रहा है ।
  3. भाषा शुद्ध साहित्यिक खड़ीबोली और शैली आलोचनात्मक है ।
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